ईश्वर क्या है ? -what is GOD?

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विशेषण के रूप में भगवान् हिन्दी में ईश्वर / परमेश्वर का मतलब नहीं रखता । इस रूप में ये देवताओं, विष्णु और उनके अवतारों (राम, कृष्ण), शिव, आदरणीय महापुरुषों जैसे गौतम बुद्ध, महावीर, धर्मगुरुओं, गीता, इत्यादि के लिये उपाधि है. तत्व एक है। तत्व अद्वैत एवं परमार्थ रूप है। जीव और जगत उस एक तत्व ́ ब्रह्म ΄ के विभाव मात्र हैं। अध्यात्म एवं धर्म के आराध्य राम तत्व हैं, अद्वैत एवं परमार्थ रूप हैं – रामु ब्रह्म परमारथ रूपा। इसी कारण राम के लिए तुलसीदास ने बार बार कहा है – व्यापकु अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप΄।

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप । किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनूरूप।। जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव दिखावअइ आपनु होइ न सोइ । ।

तुलसीदास की मान्यता है कि निर्गुण ब्रह्म राम भक्त के प्रेम के कारण मनुष्य शरीर धारण कर लौकिक पुरुष के अनूरूप विभिन्न भावों का प्रदर्शन करते हैं। नाटक में एक नट अर्थात् अभिनेता अनेक पात्रों का अभिनय करते हुए उनके अनुरूप वेषभूषा पहन लेता है तथा अनेक पात्रों अर्थात् चरितों का अभिनय करता है। जिस प्रकार वह नट नाटक में अनेक पात्रों के अनुरूप वेष धारण करने तथा उनका अभिनय करने से वे पात्र नहीं हो जाता ; नट ही रहता है उसी प्रकार रामचरितमानस में भगवान राम ने लौकिक मनुष्य के अनुरूप जो विविध लीलाएँ की हैं उससे भगवान राम तत्वतः वही नहीं हो जाते ; राम तत्वतः निर्गुण ब्रह्म ही हैं। तुलसीदास ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनकी इस लीला के रहस्य को बुद्धिहीन लोग नहीं समझ पाते तथा मोहमुग्ध होकर लीला रूप को ही वास्तविक समझ लेते हैं। आवश्यकता तुलसीदास के अनुरूप राम के वास्तविक एवं तात्विक रूप को आत्मसात् करने की है । भारत के प्रबुद्ध जन स्वयं निर्णय करें कि वास्तविक एवं तात्विक महत्व किसमें निहित है। राम की लौकिक कथा से जुड़े प्रसंगों को राजनीति का मुद्दा बनाकर राम के नाम पर सत्ता के सिंहासन को प्राप्त करने की जुगाड़ भिड़ाने वाले कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के बहकावे में आने की अथवा भगवान राम के वास्तविक एवं तात्विक रूप को पहचानने की, उनको आत्मसात् करने की, उनकी उपासना करने की, उनकी लोक मंगलकारी जीवन दृष्टि एवं मूल्यों को अपने जीवन में उतारने की।

हम सब ईश्वर में विश्वास क्यों करते हैं? इसका मुख्य कारण यह है कि हम सबको पैदा होने के समय से ही हमारे चारो तरफ ऐसा वातावरण देखने को मिलता है कि सब के सब ईश्वर में विश्वास कर रहे हैं हम देखते है कि हमारी माँ,हमारे पिता ,हमारे भी,बहिन ,पड़ोसी सभी मंदिर/चर्च जाते हैं ,घर में भी ईश्वर की पूजा करते हैं सूर्यदेव को जल चढाते हैं ,जो हट्टे कट्टे बाबा “भगवान” के रूप में हमारे घर के दरवाजे पर आते हैं उन्हें खाना,आटा ,पैसे दिए जाते हैं और आये दिन भगवान के रूप में महात्मा आते हैं पंडाल लगते हैं वहाँ प्रवचन सुनने जाते हैं वहाँ हम सब को बताया जाता है कि भगवान हैं और उन्होंने ही इस श्रष्टि का निर्माण किया है और सब कुछ उसके द्वारा ही किया जा रहा है . किसी ने देखा तो आज तक नहीं पर मानते सब आरहे हैं कि वह होता है जन्म लेता है ,अवतार लेता है लोगों के जो विचार हमारे सामने आते हैं उनको विना सोच समझे ही हम मान् लेते हैं और धारण करते जाते हैं दिमाग में पर्त दर पर्त जमा होता जाता है और हमारी धरना बन जाती है जिसमें विवेक का कोई स्थान नहीं होता है. हमें चाहिए कि अपने भगवव्दिश्रास को सजीव बनायें। भगवान् में हमारा विश्वास कितना कम हैं यही तो शोचनीय विषय है। भगवव्दिश्वास को अपने आचरण का आधारस्तम्भ न बनाकर लोग मनोविनोद के लिए प्रतिदिन बदलनेवाले तुच्छ साधनों का आश्रय लेते है। भगवव्दिश्वास की साधना ही भगवान् की सच्ची आराधना है और यही हमें पूर्णता के अति निकट ले जाने के लिए पर्याप्त है। लौकिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में हमें कुछ न रखकर सर्वस्व भगवान् को समर्पित कर देना चाहिये और उनके प्रत्येक विधान में सन्तोष का अनुभव करना चाहिये, चाहे वह विधान सुख के रूप में प्रकट हो अथवा दु:ख के। आत्मसमर्पण हो जाने पर विधान के सभी रूप हमारे लिये समान हो जायँगे। प्रार्थना में जब हमें नीरसता, भावशून्यता अथवा शिथिलता का अनुभव हो, उस समय हमें भगवद्विश्वास की आवश्यकता होती है, क्योंकि भगवद्विश्वास के अनुपात से ही भगवान् हमारे प्रेम की परीक्षा लेते हैं। यह वही समय है जब हर समर्पण के सुन्दर एवं सफल कार्य कर सकते हैं। ऐसा एक भी कार्य बन जाने पर वह हमारी आध्यात्मिक उन्नति को प्राय: अग्रसर करने में सहायक होता है।

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